कला से मिलती है कामयाबी
- Yasha Mathur
- Apr 20, 2023
- 6 min read
यशा माथुर


एक चित्र में शब्द नहीं होते लेकिन भावनाओं का आवेग दिखाई देता है। एक लिखी हुई कविता सरीखा होता है वह चित्र जो जिंदगी के कायदों को खुद में समेट लेता है। फिर चाहे इसे कैनवास पर उकेरा गया हो या घर की दीवारों पर या फिर किसी खूबसूरत कपड़े पर। चित्रकला से जुड़ाव ने महिलाओं को उस मुकाम तक पहुंचाया है जहां उन्हें गर्व और सशक्त होने का अहसास होता है। अपने देश के हर कोने में बिखरी पारंपरिक कला को साथ लेकर यह पहुंची है कामयाबी के शिखर तक ...

भूरी बाई जब बचपन में आदिवासी भील समुदाय की सांस्कृतिक परंपराओं और जनजीवन को अपने घर की दीवारों पर उकेरती थीं तो उन्हें नहीं पता था कि वे पिथौरा कला की महान हस्ती बन जाएंगीं। छुटपन में फूलों से रंग बनातीं और टहनियों से कूची और सजा देतीं अपनी झौपड़ीं की दीवारें। शादी के बाद रोजी की तलाश में जब शहर आई तो भोपाल के भारत भवन में मजदूरी का काम मिला। खाली समय में वे खाली दीवारों पर यही चित्र बनाती रहतीं। जब कला के कद्रदानों की नजर उन पर पड़ी तो वे इस अनपढ़ चित्रकार की कला देख कर दंग रह गए। यहां से शुरू हुई उनकी कला यात्रा पद्मश्री पुरस्कार के बाद भी जारी है।

जादोपटिया का जादू
कला किस तरह से महिलाओं को पहचान दिलाती है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं भूरी बाई। भूरी बाई की तरह ही कई लोक कलाओं की कलाकार महिलाएं अपनी कला के महत्व से ही अनभिज्ञ हैं। एक बार जब सूरजकुंड मेले में जाना हुआ तो वहां झारखंड की जादोपटिया चित्रकारी का सुंदर नजारा देखने को मिला। इस मशहूर चित्रकला में संताल समुदाय की लोककथाओं का चित्रण होता है। इन्हें चित्रित करने वाली जाति को संताली में जादो कहा जाता था। इस कला में चित्रकार यानी जादो, कपड़े पर कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़कर बनायी गयी पट्टियों पर चित्रकारी करते हैं इसलिए इसे जादोपटिया चित्रकारी कहते हैं। एक पट्टी पर लगभग दस से पंद्रह चित्र होते हैं जो संताल समाज के मिथकों पर आधारित लोक गाथाओं पर आधारित होते हैं। इस विलुप्त होती कला को पुर्नजीवित करने का प्रयास कर रही सरकारी संस्था झारक्राफ्ट की क्लस्टर मैनेजर शिखा आनंद ने हमें बताया कि यह संताली लोक चित्रकला है। हम आदिवासी निरक्षर महिलाओं को इस कला का प्रशिक्षण देकर सशक्त बना रहे हैं। वे साड़ी, स्टोल, कुशन कवर, टेबल मेट, फ्रिज कवर जैसी चीजें बना रही हैं और इसके जादू से आजीविका कमा रही हैं।

गोदावरी दत्त की मिथिला आर्ट
परंपरा से पद्मश्री तक का सफर
मल्लाह समुदाय की है दुलारी देवी लेकिन उन्होंने मिथिला पेंटिंग बनाना सीखा और पद्मश्री के सम्मान से सुशोभित हुईं। वह मधुबनी पेंटिंग के क्षेत्र में बड़ा मुकाम हासिल करने वाली महासुंदरी देवी और कर्पूरी देवी के यहां घरेलू सेवक के तौर पर काम किया करती थीं। यहीं दुलारी देवी ने मधुबनी पेंटिंग का शुरुआती काम सीखा था। दुलारी देवी मिथिला क्षेत्र के पारंपरिक राम-सीता चित्रों की एक प्रसिद्ध चित्रकार है। वह बाल विवाह, एड्स जागरूकता और भ्रूण हत्या जैसे सामाजिक मुद्दों को कला के जरिए उठााया है। इसी प्रकार से पंजाब के पटियाला की रहने वाली लाजवंती को फुलकारी परंपरा जिंदा रखने के लिए पद्मश्री से नवाजा गया। उत्तरपूर्वी राज्य मणिपुर की हंजबम राधे देवी दुल्हन के पहने वाली एक पारंपरिक पोशाक तैयार करती हैं जिसे पोटलोई सेटपी कहा जाता है। वह पिछले 60 सालों से यह काम कर रही हैं। पोटलोई एक बेलनाकार घाघरा, बेल्ट, ब्लाउज़ और दुपट्टे को मिलाकर बनती है। पारंपरिक रूप से घागरे को बनाने में नौ कपड़ों की परत बनाकर उसे चावल की मांड में डालकर कड़ी धूप में सुखाकर घाघरे का आकार दिया जाता है। उनके परिश्रम ने उन्हें पद्मश्री के मुकाम तक पहुंचाया। पद्मश्राी से शोभित मिथिला की शान गोदावरी दत्त की उम्र 93 हो गई है लेकिन जोश और समर्पण बरकरार है। मधुबनी कला को घर की दीवारों से निकाल कर अंतरराष्ट्रीय पटल पर लेकर आने में उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। वह कहती हैं, ‘मिथिला आर्ट बिहार की संस्कृति है। बचपन में ही हर मां घर के काम के साथ-साथ अपने बच्चों को यह कला सिखाती थीं। हर गांव में गुरुजी सब बच्चों को दालान में पढ़ाते थे। मैं भी पढ़ती और मां से कला सीखती थी। मैंने ब्याह-शादी से लेकर, राम-सीता, राधा-कृष्ण तक काफी चित्र बनाए हैं। इसके अलावा मोर, सुआ बनाना शादी में शुभ माना जाता है।

कला बनाती आत्मनिर्भर
कला महिलाओं को विशेष गुण है और यह महिलाओं को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बना कर आत्मविश्वास से भर सकती है। कुमाऊं की ऐपण कला को सीख कर महिलाएं इसे अपने रोजगार का जरिया बना रही हैं। चावल, गेरू, गेहूं का आटा, सूखी मिट्टी के रंग, रोली, हल्दी आदि का प्रयोग ऐपण बनाने में किया जाता है। बोधगया आने वाले बौद्ध श्रद्धालु अपने साथ एक पीपल वृक्ष का पत्ता जरूर लेकर जाते हैं। पीपल के पत्तों के महत्व को देखते हुए बोधगया की महिलाओं ने इसे अपना रोजगार बना लिया है। महिलाएं पीपल के पत्तों से मंडला आर्ट तैयार कर रही हैं। जिसे विदेशी लोग खूब पसंद करते हैं। आरुषि आर्ट गैलरी की फाउंडर पायल कपूर भी कहती हैं, ‘कला महिलाओं को वित्तय रूप से आत्मनिर्भर बनाती है। जो महिलाएं गांवों में रहती हैं, पढ़ी-लिखी भी नहीं है वे भी कला के माध्यम से सशक्त बन सकती हैं। जिनके पास प्रतिभा हैं उन्हें हम मदद करते हैं। कला सिर्फ पेंटिंग नहीं है, कला सिर्फ परंपरा भी नहीं है। कला टैक्सटाइल भी है। भारत में जितने सुंदर टैक्सटाइल हैं उन्हें भी कला बनाया जा सकता है।

courtesy - anjolie-ela-menon.com
मंजिल से भटकना नहीं है
मैं साठ से भी ज्यादा सालों से पेंटिंग कर रही हूं लेकिन अपने रास्ते से कभी हिली नहीं। यही संदेश में कला के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे बच्चों को भी देना चाहती हूं कि मंजिल से भटकना नहीं है। पैसे के पीछे मत भागो, अपनी प्रतिभा को उभारो। काम बढ़ेगा तो पैसा मिलेगा ही। गंभीरता और सर्मपण भाव के साथ आगे बढ़ें।
अंजलि इला मेनन
वयोवृद्ध चित्रकार

हिम्मत करें, आगे आएंगीं
महिलाओं को थोड़ी ज्यादा हिम्मत करनी पड़ सकती है, ज्यादा कोशिश करनी पड़ सकती है क्योंकि जब वे गृहस्थी में व्यस्त हो जाती हैं तो अपनी कला को समय नहीं दे पाती। इससे कला से उनका साथ छूटता जरूर है लेकिन मात्र कुछ समय के लिए। जैसे ही उनको थोड़ा समय मिलना शुरू होता है, कला जेहन में आ जाती है। वे बचपन की कला को लेकर आगे बढ़ जाती हैं। जिनमें हिम्मत होती हैं वे आगे आ जाती हैं। मैं खुश हूं कि कला में कामयाब महिलाएं ज्यादा है और अपनी भावनाओं को खुल कर अभिव्यक्त करती हैं। युवा पीढ़ी की उलझनों और कष्टों की थैरेपी है कला।
शोभा ब्रूटा
वरिष्ठ चित्रकार

कला में खोकर बना लें खुद को मजबूत
यदि युवा महिलाओं की कला में रुचि है तो वे इसका ज्ञान प्राप्त करें। युवा पीढ़ी अगर कला को ही अपना नशा बना लें तो उनकी जिंदगी ही बदल जाएगी। इससे देश भी खुशहाल बनेगा। देश के कोने-कोने में हर कला जाएगी। युवाओं को तनाव ज्यादा है तो वे कला में खो जाएं और खुद के भीतर से मजबूत बना लें। मनोवैज्ञानिक की बजाय कला की कार्यशाला में जाएं। पूरे देश में कॉलेज आफ आर्ट्स हैं, शांतिनिकेतन जैसी संस्थाएं हैं, उनमें विद्या लें। जिंदगी संवर जाएगी। कला सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं है यह जिंदगी है, जिंदगी की शैली है। युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए हम कला उत्सव ‘आर्टेक्स’ का आयोजन कर रहे हं। वहां कला संग्रहणकर्ता आऐंगे जिनसे युवा उत्साही कलाकार बातचीत कर सकते हैं उनकी सफलता की कहानी सुन कर अपना रास्ता चुन सकते हैं। कला का ज्ञान पा सकते हैं।
पायल कपूर
फाउंडर आरुषि आर्ट्स

मैंने अपनी शैली विकसित की
मैं आदिवासी समुदाय से ही आती हूं। मैंने गोंड चित्रकला अपने पिताजी जनगण सिंह श्याम से ही सीखी है। इसे मेरे पिताजी ने ही शुरू किया था। हमारी पारंपरिक कला ठींगना में हमारे यहां दीवारों पर चित्र बनाए जाते थे उनमें त्रिकोण या चर्तुभुज आकृति में देवी-देवता के चित्र बनाए जाते थे। शादी ब्याह के दौरान रीति रिवाज निभाए जाते थे। इनमें कोई आकृति नहीं होती थी। मेरे पिताजी से पहले गोंड परधान चित्रकला की जानकारी नहीं थी। पिताजी ने इस कला में आकृति डाली, अपने रीति रिवाजों को डाला। अपनी कल्पना, सोच और कहानी डाली। इसे हम कंटेपरेरी भी बोल सकते हैं। पिताजी को कला में डूबते और अपने आस-पास रंग और कूची देख कर मैं चित्रकला करने लगी। मैं जानवर ओर मनुष्य की आकृति के साथ अपनी संस्कृति, जंगल, जानवर और अपनी जीवनशैली को दिखाती हूं। मैंने काले कैनवास पर सफेद रंग से काम कर अपनी शैली विकसित की है। मेरी कला में इनोवेशन है। महिलाओं की मनोदशा का चित्रण इतना आसान नहीं होता। मैं भी गांव से आती हूं। यहां पर महिलाओं के कई बंधन हैं। मैं उनका चित्रण करती तो लोग कहते कि ऐसे चित्र क्यों बनाती हो लेकिन अब उन्होंने भी कहना बंद कर दिया। मैं अपने मन से बनाए चित्र लेकर आती हूं। इसी ट्राइबल आर्ट से ही मेरी पहचान है।
जापानी श्याम
ट्राइबल आर्टिस्ट
यशा माथुर



Lovely write up
बहुत ही अच्छा लिखा। लेख की शुरुआत बेह्तरीन है। जितनी सुन्दर चित्रकला, उतने ही सुन्दर इनको बनाने वालों के नाम।