शक्ति का हर गुण समााया है आज की नारी में
- Yasha Mathur
- Apr 15, 2024
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यशा माथुर

आज अष्टमी है। मां दुर्गा को भक्ति भाव से पूजने का दिन। शक्ति की अराधना करने का दिन। शक्ति के नौ स्वरूप हैं और आप देखेंगे कि भारत की नारी में यह सभी शक्तियां विद्यमान हैं। इनमें मां शैलपुत्री की दृढ़ता भी है तो कूष्मांडा मां की रचनात्मकता भी। जब आत्मसम्मान पर बात आती है तो यह मां कालरात्रि बन कर दुष्टों और बुराई की संहारक बन जाती हैं और जब शांत होकर जिंदगी गुजारने का फैसला करती हैं तो मां महागौरी की शाीतलता प्रदर्शित करती हैं।
सती की दृढ़ता दिखती है
मां का शैलपुत्री स्वरूप दृढ़ता का प्रतीक है। वह दृढ़ता, जो अन्याय के प्रति खड़े होने की शक्ति बनती है। पति के सम्मान के लिए स्वयं को भस्मीभूत करने वाली सती ने अपने पिता को कभी क्षमा नहीं किया। पुनर्जन्म में हिमालय की पुत्री बनकर शैलपुत्री कहलाईं। आज की महिलाओं में शक्ति के इस स्वरूप की झलक मिलती है, जो दृढ़ता के साथ जीवन की हर मुश्किल का सामना कर रही हैं। तलाक का दंश झेलने वाली वंदना शाह आज देश की जानी मानी तलाक वकील हैं। उनके ससुराल वालों ने उन्हें रात के दो बजे घर से निकाल दिया था। तब उनके पास केवल साढ़े सात सौ रुपये थे और वह मात्र 28 साल की थीं। उन्हें कानून की जानकारी तो थी नहीं इसलिए उन्हें काफी परेशानियां झेलनी पड़ीं। उनका तलाक की प्रक्रिया पूरी होने में दस साल लग गए। अपने इस कटु निजी अनुभव के बाद उन्होंने लॉ की पढ़ाई की और फिर अन्य महिला-पुरुषों को कानूनी सहारा देने में जुट गईं। वंदना शाह कहती हैं, 'मैं कह सकती हूं कि मैंने अपनी लड़ाई अपने दम पर जीती। आज मैं ऐसी आत्मनिर्भर वकील हूं, जिससे महिलाएं प्यार करती हैं। वे मुझसे ही काम करवाना चाहती हैं। दुर्भाग्यवश जब किसी महिला की शादी में विवाद उत्पन्न हो जाता है तो उसे सलाह देने के लिए हजारों लोग सामने आ जाते हैं लेकिन वास्तव में वे समझ नहीं पाते कि महिला को उस समय भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है।'
संघर्ष नहीं हरा सकता
ब्रह्मचारिणी स्वरूप माता के संघर्ष का प्रतीक है। भोले शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए देवी ने वर्षों कठिन तपस्या की और अंत में मनचाहे वरदान की स्वामिनी बनी। यह संघर्ष आज की नारी में भी नजर आता है। कर्मठ नारी अबला से सबला बनने के लिए हर पल संघर्ष कर रही है। राजस्थान के दौसा के मंडावर गांव की शिवानी साहू इसकी मिसाल हैं। उन्होंने मुश्किल हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय इनसे लड़कर आगे बढ़ना सही समझा और अंतत: उन्होंने अपने जीवन की एक अहम मंजिल को पा लिया। शिवानी को बचपन में ही हाकी का जुनून चढ़ गया। अपनी मेहनत और प्रतिभा से आज वह पूरे देश में नाम कमा रही हैं। शिवानी ने अंडर-16 में इंटनेशनल खेला। अंडर-17 की सब-जूनियर टीम की कैप्टन रहीं और अब भारतीय टीम में उनका चयन हो चुका है। शिवानी के पिता सीताराम साहू गांव में पकौड़े का ठेला लगाते हैं।समाज का सामना साहस से मां का चंद्रघंटा स्वरूप साहस का प्रतीक है। बदलते सामाजिक परिवेश में महिलाएं भयभीत होकर चुप नहीं बैठ रहीं, बल्कि अपने अधिकारों के लिए साहस से लड़ रही हैं। बालीवुड कोरियोग्राफर करिश्मा को यह बात गलत साबित करनी थी कि वजन ज्यादा हो तो कोई डांसर या कोरियोग्राफर नहीं बन सकता, बालीवुड इंडस्ट्री में काम नहीं कर सकती। जितनी बार लोगों ने बोला तुम नहीं कर पाओगी, उतनी ही मजबूती से वह आगे बढ़ीं। वह कहती हैं, 'अगर आपका वजन ज्यादा होता है तो लोग चिढ़ाते हैं, मजाक उड़ाते हैं। एहसास कराते हैं कि तुम्हारा वजन ज्यादा है। लेकिन मुझे कुछ बनना था तो मैंने अपने वजन के प्रति शर्मिंदगी महसूस नहीं की और आज मैं सफल कोरियोग्राफर हूं। चुनौती स्वीकार कर जीतना अब मेरे स्वभाव में है।'
सृष्टि नहीं तो रच रहीं अपना जीवन
कूष्मांडा मां को आदिशक्ति कहते हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को रचने वाली हैं। आज महिलाओं की रचनात्मकता समाज और देश को सुंदर बना रही है। इंटीरियरमाता यूट्यूब चैनल से मशहूर होने वाली अनन्या भट्टाचारजी आज अपनी रचनात्मकता से अपना व दूसरों का संसार रच रही हैं। वह अपने चैनल पर आंतरिक सजावट के गुर बताती हैं और करीब सात लाख से भी ज्यादा लोग उनके सुझावों को पसंद करते हैं। कहती हैं अनन्या, 'शादी के बाद कोलकाता से मुंबई आ गई। मैंने वहां आर्किटेक्ट की जॉब की लेकिन जब पति के साथ बड़ौदा शिफ्ट होना पड़ा तो मुझे मनमाफिक काम नहीं मिला। मैं काफी परेशान और तनाव में रहने लगी। फिर एक दिन हिम्मत जुटाकर मैंने सुबह यूट्यूब अकाउंट इंटीरियरमाता बनाया। पुराने कैमरे व पुराने लैपटाप से वीडियो रिकार्ड किया और बिना एडीटिंग के ही डाल दिया। एक सप्ताह में मेरे वीडियो को दस हजार लोगों ने देखा। मैंने रिसर्च किया तो पता चला कि हमारे देश में भारतीय साज-सज्जा के वीडियो देखने के लिए बहुत लोग इच्छुक हैं लेकिन उन्हें ऐसे वीडियो नहीं मिल रहे थे। कैमरे के सामने हर दिन बोलना और वीडियो एडीटिंग करना मुश्किल था लेकिन मैंने सब सीखा और आज हमारा चैनल तो है ही, इंटीरियर डिजाइनिंग का स्टूडियो भी है।'
ज्ञान बसा है भीतर
स्कंदमाता ज्ञान की देवी हैं। आज महिलाएं अपने ज्ञान, विवेक और चेतना से हर जगह झंडे गाड़ रही हैं। युवा गणितज्ञ प्रोफेसर नीना गुप्ता को तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द ने नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया था। नीना राजस्थान की बेटी हैं और भारतीय सांख्यिकी संस्थान में विज्ञानी हैं। नीना को इससे पहले 70 साल पुरानी बीजगणित की पहेली सुलझाने के लिए रामानुजन पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। इसे सुलझाने में उन्हें पांच-छह साल लगे। नीना कहती हैं, 'गणित से डरें नहीं। बचपन में मुझे भी गणित में पूरे नंबर नहीं आते थे, लेकिन मुझे गणित के सवालों को हल करना और घंटों इसमें लगे रहना अच्छा लगता था। आज मैं देखती हूं कि हर चीज में गणित है। यदि हम गणित को रोजमर्रा की चीजों से जोड़ लें तो कभी बोर नहीं होंगे। हम गणित की प्रैक्टिस करें तो हमें यह भाने लगेगी।'आगे बढ़ने का रोडमॅप करती है खुद तय माता कात्यायनी से महिलाओं को हर बात को जांचने-परखने का गुण मिला है। आज वे बहुत सोच-समझ कर आगे बढ़ रही हैं। न्यूरोसर्जन के क्षेत्र में महिलाओं के लिए तमाम कठिनाइयां होने के बावजूद डा. श्रद्धा माहेश्वरी ने अपने दृढ़ संकल्प को नहीं छोड़ा। वह मुंबई की तीसरी महिला न्यूरोसर्जन बताई जाती हैं। अपने जुनून और दृढ़ता के जरिए उन्होंने कई अन्य महिलाओं को इस रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया है। वह कहती हैं, 'मुझे डाक्टर ही बनना था। लेकिन जब मैंने अखबार में न्यूरोसर्जन के बारे में पढ़ा तो इसी क्षेत्र को चुनने की ठान ली। मेरा सेलेक्शन हो गया लेकिन कई वरिष्ठ डाक्टरों ने कहा कि यह क्षेत्र महिलाओं के लिए नहीं है। मेरे माता-पिता ने प्रोत्साहित किया और कहा कि जो करने के बारे में सोचा है वही करो। काफी समय बाद मैंने जाना कि देश में मात्र एक प्रतिशत महिला न्यूरोसर्जन हैं। अफसोस की बात है कि लोगों को एक महिला को न्यूरोसर्जन स्वीकार करने में बहुत कठिनाई होती है।'डटकर बुराई से करतीं मुकाबलामां कालरात्रि दुष्टों की, बुराई की संहारक हैं। आज की महिला अत्याचार सहती नहीं, बल्कि डटकर उसका मुकाबला करती है। सीमा सिंह कभी साधारण गृहिणी थीं। उन्होंने अपनी बेटी के लिए सुयोग्य वर खोज निकाला लेकिन जब बात आगे बढ़ी और सगाई हो गई तो लड़के वालों की तरफ से मांगे बढ़ती गईं। लाखों के दहेज की मांग की गई और उन्हें बेटी की सगाई तोड़नी पड़ी। इस पीड़ा से गुजरने के बाद उन्हें बाकी लड़कियों की जिंदगी बचाने की प्रेरणा मिली। सीमा सिंह ने 'नो डावरी शादी' नाम से वेब पोर्टल शुरू किया और दहेज नहीं चाहने वाले लड़के-लड़कियों के रिश्ते बनवाने लगीं। निराशा के दिनों में भी वह हारी नहीं और समाज की इस बुराई के खिलाफ डटकर खड़ी हो गईं। सीमा कहती हैं, 'बेटी के होने वाले ससुराल से दहेज की मांग की गई तो हमने सगाई तोड़ने में एक दिन भी नहीं लगाया। मैं आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है हमारा फैसला सही था।'
इच्छाशक्ति के बल पर बदला अपना जीवन
मां महागौरी शांत हैं। शांत रूप से जिंदगी के हर पल का मनन कर आगे बढ़ने की शक्ति को भी आज की नारी ने खुद में संचित किया है। डाइटिशियन व 'आस एक प्रयास' की संस्थापक दीपिका ए. भाटिया को अंतिम स्टेज पर कैंसर का पता चला, लेकिन उन्होंने अपनी हिम्मत के बल पर इस कठिन समय को जीता। वह बताती हैं, 'मेरी बड़ी आंत ही नहीं है। उसमें 28 ट्यूमर थे। डाक्टरों ने तो मुझे जवाब दे दिया था लेकिन मेरी इच्छाशक्ति इतनी मजबूत थी कि मैं इससे बाहर आई। मैं दूध नहीं पी सकती, मिर्च नहीं खा सकती। दिन में नौ बार टायलेट जाती हूं। बहुत मुश्किल समय था। महंगा उपचार था। लेकिन मैं डाइटिशियन थी इसलिए इतना पता था कि इससे आगे कैसे जा सकती हूं। मेरे पिताजी की भी कैंसर से मृत्यु हुई तो मुझे लगता था कि जिसको एक बार कैंसर हो जाता है तो वह बचता नहीं है। पर बच्चों के लिए जीने की इच्छा थी। जब मेरी कीमोथेरेपी हो रही थी तो पार्क में जागरूकता फैलाने जाती थी। मुझे समझ में नहीं आता था कैंसर क्यों हुआ? यही जानने के लिए मैंने डाइट के एडवांस कोर्स शुरू किए। आज मेरे डाइट प्लान से काफी कैंसर रोगी ठीक हो चुके हैं। क्योंकि मेरा मानना है कि हमारे शरीर में अधिकतर रोग जीवनशैली से होते हैं।' दीपिका ने शुरू में 'कैंसर फ्री इंडिया' के नाम से एनजीओ बनाकर काम करना शुरू किया। अब वह झुग्गियों में कैंसर के प्रति जागरूकता पैदा करती हैं। स्वस्थ दिनचर्या के बारे में बताती हैं। वह कहती हैं कि अपनी इच्छाशक्ति से हम अपनी जिंदगी बदल सकते हैं स्वावलंबन को पा सकते हैं।

दान करती हैं स्वयोगदान
मां सिद्धिदात्री भूमिका दात्री की है। आज की परहितकारी महिलाएं खुलकर समाज की बेहतरी के कामों में लगी हैं। आम गृहिणी भी अपनी तपस्या से अपने परिवार को सींचती है। सोशल एक्टिविस्ट मुखी रोशनी शर्मा कहती हैं, 'हम अगर अपनी संस्कृति से जुड़े हैं तो हम मानते हैं कि स्त्री देवी का रूप है। उसके पास शक्ति है। मैं जैसे-जैसे लोगों से जुड़ी, अपनी संस्कृति के पास गई, वेद-ग्रंथ पढ़े तब मैंने जाना कि स्त्री से ज्यादा मजबूत कोई नहीं होता है। हम पूरे परिवार को संभालते हैं। एक स्त्री दस लोगों को एक साथ पालने की इच्छाशक्ति रखती है। नवरात्र में हमें प्रण लेना होगा कि हर स्त्री दुर्गा है। हम मजबूत बनेंगे। मैं पहले घरेलू महिला ही थी। लेकिन फिर मैंने इंटीरियर डिजाइनिंग किया। जब मुझे आत्मसंतुष्टि मिली तो मैंने घर से बाहर निकल कर संसार देखा। कोराना काल में मैंने पूरे भारत में निशुल्क यज्ञ करवाए हैं। मै अकेली घर से निकली, आज मेरे साथ सैकड़ों लोग जुड़े हैं। इस पड़ाव पर आकर मैं महसूस करती हूं कि हमें किसी सहारे की जरूरत नहीं है। जब हम ठान लेते हैं, तो हमें अपने भीतर की शक्ति समझ में आ जाती है। कोरोना काल में तो यह साबित हो गया कि महिलाएं कुछ भी कर सकती हैं।'


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